बुधवार, 2 जनवरी 2013

मधेपुरा का इतिहास



मधेपुरा अर्थात अंग, बंग तथा मिथिला का मध्यपूरा. इसी भौगोलिक स्थिति ने मधेपुरा को 1845 ई. में बंगाल प्रेसीडेंसी के भागलपुर जिला का अनुमंडल बनाया. इसी धरती पर कोसी की भीषण विभीषिका ने जहाँ अबाध रूप से अपने विनाश का तांडव किया, वही लोगों की अदम्य इच्छा शक्ति तथा जिजिविषा ने पुनर्निर्माण एवं फिर से इलाके को सजाने का काम किया. हवालदार त्रिपाठी की पुस्तक बौद्ध धर्म तथा बिहार में इस इलाके को उदृत करते हुए उन्होंने लिखा है की जंगल एवं कोसी तथा उसकी छाडन धाराओं से आच्छादित गंगा का समस्त उत्तरी भूभाग आर्यों के आगमन से पूर्व ब्रात्यों का निवास स्थल था. इस क्षेत्र में आर्यों के आगमन के संदर्भ में वेदों में कोई चर्चा नहीं है. लेकिन हठयोगी ब्रात्यों के कारण लम्बे अर्से तक आर्य इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाये थे. कालांतर में आर्यों ने यहाँ अपने प्रभाव का विस्तार कर वर्चस्व स्थापित किया.                                                                                                                                                      आर्य संस्कृति के अंतर्गत यह भूमि ऋषियों की तपस्थली थी. रामायण काल में यहाँ ऋषि श्रृंग का आश्रम था. किंवदंती है की त्रेता के मर्यादा पुरुषोतम श्री राम के जन्म के निमित्त ऋषि श्रृंगी द्वारा सम्पादित पुत्रेष्ठी यज्ञ यही हुआ था. सिंहेश्वर स्थान का सतोखर ग्राम सप्तपुष्कर यज्ञ का सप्तकुंड था.  
                  मधेपुरा महाभारत कालीन अंगदेश का मध्यपुरी था. प्राचीन अवशेषों एवं प्राप्त प्रतिमाओं से पता चलता है की बौद्ध युग एवं गुप्तकालीन स्वर्णयुग में भी अपने अस्तित्व को कायम रखते हुए इस धरती ने उत्थान-पतन के आलोडन-विलोड़न पर समासीन युग को अपना नेतृव प्रदान किया था. कुषाणों ने उत्तर भारत में कई राज्य स्थापित किये. रायभीड़ एवं बसंतपुर में सम्प्रति ये बहलांश में मौजूद हैं. कुषाण वंश के पतनोपरांत गुप्त शासकों ने उत्तरी बिहार को दो भक्तिओं में विभक्त कर दिया. तीरभुक्ति और पौंड्रवर्धन भुक्ति. वर्तमान पूर्णिया और कोसी प्रमंडल तथा  नेपाल का तराई भाग पौंड्रवर्धन भुक्ति के अधीन था.
                  यह क्षेत्र गुप्त स्वर्णयुग में आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से काफी समुन्नत था. गुप्तवंश के पतन के बाद स्थिति का लाभ उठाते हुए कामरूप के राजा पूर्णवर्धन ने मधेपुरा तथा सहरसा के सारे क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया. भाष्कर वर्धन ने तो अपने राज्य का नालंदा तक विस्तार किया.
                  बौद्धकाल में बुद्ध के पावन पद इस धरती पर पड़े. बौद्ध साहित्य में इस संबंध में कई प्रसंग उल्लिखित हैं. पाल वंश के सूर्यास्त के पश्चात् मधेपुरा क्षेत्र में बौद्ध मठ हिन्दू मंदिरों में परिवर्तित होने लगे.भगवान बुद्ध हिन्दुओं द्वारा दसावतार के एक अवतार के रूप में स्वीकृत कर लिए गए. मध्ययुग के महान विद्वान् पंडित मंडन मिश्र का शंकराचार्य से शास्त्रार्थ सिंहेश्वर में हुआ था. इस शास्त्रार्थ में पराजित होने के बाद वे बौद्ध से सनातन बने थे. प्रतिक के रूप में अब भी सिंहेश्वर के पूर्वाभिमुख गर्भगृह के बाहरी दीवार पर भगवान बुद्ध अवलोकितेश्वर की प्रतिमा जप करते दिख पड़ते हैं.
                  पालवंश के अंतिम शासक गोविन्द पाल के समय में मुसलमानों का हमला प्रारंभ हो चूका था. इसी समय इस क्षेत्र की कमजोर तथा भयाक्रांत जनता विभिन्न लोक देवों से जुड़ती गई. इसमें खेदन महाराज, सोनाय महाराज, चिल्का महाराज, शिवदत, घोघन, सरूप, लाल महाराज, रन्नू सरदार, कारू खिरहरी, दिना भदरी, मीरा साहब आदि प्रमुख हैं. युग पुरुष लोरिक के आख्यान लोकगीतों में बिखरे पड़े हैं, जिन्हें हमारे ग्रामीणों ने समवेत स्वरों में गा-गाकर अपने पूर्वजों की स्मृति को अक्षुण्ण रखा है.
                  पाल के पत्नोपरांत यहाँ मिथिला के कर्नाट शासन का अभ्युदय हुआ. तत्पश्चत बंगाल के सेन शासकों ने मधेपुरा को अपने अधीन कर लिया. राजनितिक दृष्टिकोण से मधेपुरा का इलाका सेन और कर्नाट शासकों के लिए काफी महत्वपूर्ण था सेन शासक बल्लाल सेन ने जब मधेपुरा को कर्नाट शासकों से जीत लिया तो उनके पिता ने उन्हें निःशंक शंकर की उपाधि से विभूषित किया. इस उपाधि के स्मारक स्वरुप निःशंकनुर परगना स्थापित किया गया. मधेपुरा का राजस्व नाम आज भी निःशंकनुर ही है.
                  अकबर के शासनकाल में मधेपुरा एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था. सन 1982 में राजा टोडरमल ने इस क्षेत्र के कई परगनाओं के भूमि का पैमाईश कर मालगुजारी व्यवस्था लागु कर दी. संपूर्ण सूबा सरकारों में और सरकार महलों में विभक्त कर दिया गया था. ग्वालपाड़ा प्रखंड के सरसंडी गांव में अकबर ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था. वह मस्जिद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है. सम्प्रति मस्जिद का स्थल ईदगाह में बदल गया है.
                  मुगलकाल में निःशंकपुर परगना के दुर्गापुर में पश्चिम तिरहुत के दारानगर से आकर एक परमार सरदार हसरत सिंह ने अपना राज्य स्थापित किया. उसने अपनी शक्ति बढ़ाकर निःशंकपुर और उत्तराखंड के कुछ भाग पर विजय प्राप्त कर एक स्वतंत्र राज्य कायम किया. उसने अपने अनुज माधव सिंह को अपने राजस्व के वैधानिकता का आदेश प्राप्त करने दिल्ली भेजा. माधव सिंह ने वहां इस्लाम धर्म काबुल कर लिया. दिल्ली से लौटते समय मधेपुरा से 18 मील दक्षिण लदारीघाट में उसकी हत्या कर दी गई. उसकी कब्र लदारीघाट में मौजूद है, जो एक फ़क़ीर की देखरेख में है. माधव सिंह के वंशज मुसलमान आज भी नावहट्ट में बसे हुए हैं.
            छह परगना को 1978 में तिरहुत से पृथक कर तत्कालीन जिला भागलपुर में मिला दिया गया. प्राप्त अभिलेख के अनुसार 1788 ई. में राजा किशुन सिंह से 5 हजार बीघा जमीन खरीदकर सरकार ने जमीनदारों को दी थी. बाद में छह एवं धरमपुर परगना के कुछ भाग को काटकर आरगिंस राइट्स नामक यूरोपीय व्यक्ति को खेती करने के लिए दी गई थी. 10 फरवरी 1811 ई. को बुकानन ने फुलौत, आलमनगर की यात्रा की थी. जिसका वृतांत 'एन एकाउंट ऑफ़ भागलपुर' में वर्णित है. शाह आलमनगर के चंदेल शासकों द्वारा निर्मित जलाशय और दुर्ग आज भी विधमान है.
            ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन काल में प्रशासनिक दृष्टीकोण से 1793 ई. में तिरहुत के कुछ गाँव तत्कालीन जिला भागलपुर में शामिल करा दिये गए, जिसमें मधेपुरा भी शामिल था. सन 1838 ई. में तिरहुत के तीन परगना नारेदिगर, मल्लनीगोपाल और निःशंकपुर परगना का सम्पूर्ण क्षेत्र भागलपुर को स्थान्तरित कर दिया गया. इसी अवधि में मुंगेर के कबरखंड, उत्तराखंड को भी भागलपुर में शामिल कर दिया गया. इस प्रकार गंगा के उत्तर नौगछिया पुलिस जिला को छोड़कर शेष भाग नेपाल सीमा तक एक विस्तृत भू-भाग को समेकित कर एक नई प्रशासनिक व्यवस्था का का सूत्रपात किया गया. तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के भागलपुर जिला के इस उत्तरी भू-भाग में तीन सितम्बर 1845 ई. को एक नये अनुमंडल का निर्माण किया गया. मधेपुरा राजनीतिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चूका था. भारत की आजादी के संग्राम में मधेपुरा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. डॉ के.के.दत्ता रचित पुस्तक 'Freedom movement in Bihar' में वर्णित उल्लेख समीचीन :- "The northern Bhagalpur played a heroic and historic role in the war of National independence" बिहार जिला गजेटियर -सहरसा - 1965 के कुछेक अंशो को उद्धत करने से इस बात की पुष्टि होती है उत्तरी भागलपुर अर्थात तत्कालीन मधेपुरा अनुमंडल के नागरिकों की आजादी की लड़ाई में उल्लेखनीय भूमिका रही है. "Madhepura was the main center of the congress organization from the very beginning and even before separation of Bihar and Bengal provincial congress committee". on 13th august(1942) a huge mass of people under the leadership of shri Bhupendra Narayan Mandal, Mahtab Lal Yadav, Deota Prasad Singh and others arrived in the court compound and a young lad of 14 years named Harekrishna Choudhary climbed the upstairs and hoisted the national flag on the treasury building of Madhepura court. All the police stations in the sub-division were taken possession of".
कालांतर में मधेपुरा ने लम्बा सफ़र तय कर जिला का रूप लिया.